कभी-कभी
उजाले का आभास
अंधेरे के इतने क़रीब होता है
कि दोनों को अलग-अलग
पहचान पाना मुश्किल हो जाता है।

धीरे-धीरे
जब उजाला
खेलने-खिलने लगता है
और अंधेरा उसकी जुम्बिश से
परदे की तरह हिलने लगता है
तो दोनों की
बदलती हुई गति ही
उनकी सही पहचान बन जाती है।

रोशन अंधेरे के साथ
लाली की नामालूम-सी झलक
एक ऐसा रंग रच देती है
जो चितेरे की आँख से ही
देखा जा सकता है।
क्योंकि उसका कोई नाम नहीं होता।
फिर रंगों के नाम
हमें ले ही कितनी दूर जाते हैं?
कोश में हम उनके हर साये के लिए
सही शब्द कहाँ पाते हैं?

रंगों की मिलावट से उपजा
हर अन्तर, हर अन्तराल
एक नए रंग की सम्भावना बन जाता है
और अपना नाम स्वयं ही
अस्फुट स्वर में गाता है

कभी सुना है तुमने
प्रत्यक्ष रंगों को गाते हुए?
एक साथ स्वर-बद्ध होकर
सामने आते हुए?


About Jagdish Gupt


Dr. Jagdish Gupt (Hindi: डा. जगदीश गुप्त) was a well-known poet of the Chhayavaad (छायावाद) generation, a period of romanticism in Modern Indian Hindi poetry. Read more...

Poet of the day

Katherine Fowler was born on New Year's day, 1631 in London, England. Her father, John Fowler, was a Presbyterian merchant. Katherine was educated at one of the Hackney boarding-schools, where she became fluent in several languages. After the death of John Fowler, Katherine's mother married a Welshman, Hector Philips, and,...
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Poem of the day


One lovely name adorns my song,
And, dwelling in the heart,
Forever falters at the tongue,
And trembles to depart.


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